रुद्रसंहिता, प्रथम (सृष्टि) खण्ड अध्याय 15
सृष्टि का वर्णन
तदनन्तर नारदजी के पूछने पर ब्रह्मा जी बोले-मुने ! हमें पूर्वोक्त आदेश देकर जब महादेव जी अन्तर्धान हो गये, तब मैं उनकी आज्ञा का पालन करने के लिये ध्यानमग्न हो कर्तव्य का विचार करने लगा। उस समय भगवान् शंकर को नमस्कार करके श्रीहरि से ज्ञान पाकर परमानन्द को प्राप्त हो मैंने सृष्टि करने का ही निश्चय किया। तात ! भगवान् विष्णु भी वहाँ सदाशिव को प्रणाम करके मुझे आवश्यक उपदेश दे तत्काल अदृश्य हो गये। वे ब्रह्माण्ड से बाहर जाकर भगवान् शिव की कृपा प्राप्त करके वैकुण्ठधाम में जा पहुँचे और सदा वहीं रहने लगे। मैंने सृष्टि की इच्छा से भगवान् शिव और विष्णु का स्मरण करके पहले के रचे हुए जल में अपनी अंजलि डालकर जल को ऊपर की ओर उछाला। इससे वहाँ एक अण्ड प्रकट हुआ, जो चौबीस तत्त्वों का समूह कहा जाता है। विप्रवर ! वह विराट् आकार वाला अण्ड जड रूप ही था। उसमें चेतनता न देखकर मुझे बड़ा संशय हुआ और मैं अत्यन्त कठोर तप करने लगा। बारह वर्षों तक भगवान् विष्णु के चिन्तन में लगा रहा। तात ! वह समय पूर्ण होने पर भगवान् श्रीहरि स्वयं प्रकट हुए और बड़े प्रेम से मेरे अंगों का स्पर्श करते हुए मुझ से प्रसन्नतापूर्वक बोले।
श्रीविष्णु ने कहा– ब्रह्मन् ! तुम वर माँगो। मैं प्रसन्न हूँ। मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है। भगवान् शिव की कृपा से मैं सब कुछ देने में समर्थ हूँ।
ब्रह्मा बोले– (अर्थात् मैंने कहा-) महाभाग ! आपने जो मुझपर कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है; क्योंकि भगवान् शंकर ने मुझे आप के हाथों में सौंप दिया है। विष्णो! आपको नमस्कार है। आज मैं आपसे जो कुछ माँगता हूँ, उसे दीजिये। प्रभो! यह विरारुप चौबीस तत्त्वों से बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है, जडीभूत दिखायी देता है। हरे ! इस समय भगवान् शिव की कृपा से आप यहाँ प्रकट हुए हैं। अतः शंकर की सृष्टि-शक्ति या विभूति से प्राप्त हुए इस अण्ड में चेतनता लाइये। मेरे ऐसा कहने पर शिव की आज्ञा में तत्पर रहने वाले महाविष्णु ने अनन्तरूप का आश्रय ले उस अण्ड में प्रवेश किया। उस समय उन परम पुरुष के सहस्त्रों मस्तक, सहस्त्रों नेत्र और सहस्त्रों पैर थे। उन्होंने भूमि को सब ओर से घेरकर उस अण्ड को व्याप्त कर लिया। मेरे द्वारा भली भाँति स्तुति की जाने पर जब श्रीविष्णु ने उस अण्ड में प्रवेश किया, तब वह चौबीस तत्त्वों का विकार रूप अण्ड सचेतन हो गया। पाताल से लेकर सत्य लोक तक की अवधि वाले उस अण्ड के रूप में वहाँ साक्षात् श्रीहरि ही विराजने लगे। उस विराट् अण्ड में व्यापक होने से ही वे प्रभु ‘वैराज पुरुष’ कहलाये। पंचमुख महादेव ने केवल अपने रहने के लिये सुरम्य कैलास-नगर का निर्माण किया, जो सब लोकों से ऊपर सुशोभित होता है। देवर्षे ! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नाश हो जाने पर भी वैकुण्ठ और कैलास -इन दो धामों का यहाँ कभी नाश नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ ! मैं सत्यलोक का आश्रय लेकर रहता हूँ। तात ! महादेवजी की आज्ञा से ही मुझमें सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न हुई है। बेटा ! जब मैं सृष्टि की इच्छा से चिन्तन करने लगा, उस समय पहले मुझसे अनजान में ही पापपूर्ण तमोगुणी सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ जिसे अविद्या-पंचक (अथवा पंचपर्वा अविद्या) कहते हैं। तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर शम्भु की आज्ञा से मैं पुनः अनासक्त-भाव से सृष्टि का चिन्तन करने लगा। उस समय मेरे द्वारा स्थावर-संज्ञक वृक्ष आदि की सृष्टि हुई, जिसे मुख्य-सर्ग कहते हैं। (यह पहला सर्ग है।) उसे देखकर तथा वह अपने लिये पुरुषार्थ का साधक नहीं है, यह जानकर सृष्टि की इच्छा वाले मुझ ब्रह्मा से दूसरा सर्ग प्रकट हुआ, जो दुःख से भरा हुआ है; उसका नाम है- तिर्यक्स्त्रोता। वह सर्ग भी पुरुषार्थ का साधक नहीं था।। उसे भी पुरुषार्थ साधन की शक्ति से रहित जान जब मैं पुनः सृष्टि का चिन्तन करने लगा, तब मुझसे शीघ्र ही तीसरे सात्त्विक सर्ग का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे ‘ऊर्ध्वंस्त्रोता’ कहते हैं। यह देवसर्ग के नाम से विख्यात हुआ। देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है। उसे भी पुरुषार्थ साधन की रुचि एवं अधिकार से रहित मानकर मैंने अन्य सर्ग के लिये अपने स्वामी श्रीशिव का चिन्तन आरम्भ किया। तब भगवान् शंकर की आज्ञा से एक रजोगुणी सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अर्वाक्स्रोता कहा गया है। इस सर्ग के प्राणी मनुष्य हैं, जो पुरुषार्थ साधन के उच्च अधिकारी हैं। तदनन्तर महादेवजी की आज्ञा से भूत आदि की सृष्टि हुई। इस प्रकार मैंने पाँच तरह की वैकृत सृष्टि का वर्णन किया है। इनके सिवा तीन प्राकृत सर्ग भी कहे गए हैं, जो मुझ ब्रह्मा के सानिध्य से प्रकृति से ही प्रकट हुए हैं। इनमें पहला महत्तत्व का सर्ग है, दूसरा सूक्ष्म भूतों अर्थात् तन्मात्राओं का सर्ग है और तीसरा वैकारिक सर्ग कहलाता है। इस तरह ये तीन प्राकृत सर्ग हैं। प्राकृत और वैकृत दोनों प्रकार के सर्गो को मिलाने से आठ सर्ग होते हैं। इनके सिवा नवाँ कौमार सर्ग है, जो प्राकृत और वैकृत भी है। इन सब के अवान्तर भेद का मैं वर्णन नहीं कर सकता; क्योंकि उसका उपयोग बहुत थोड़ा है। अब द्विजात्मक सर्ग का प्रतिपादन करता हूँ। इसी का दूसरा नाम कौमार सर्ग है, जिसमें सनक-सनन्दन आदि कुमारों की महत्त्वपूर्ण सृष्टि हुई है। सनक आदि मेरे चार मानस पुत्र हैं, जो मुझ ब्रह्मा के ही समान हैं। वे महान् वैराग्य से सम्पन्न तथा उत्तम व्रत का पालन करने वाले हुए। उनका मन सदा भगवान् शिव के चिन्तन में ही लगा रहता है। वे संसार से विमुख एवं ज्ञानी हैं। उन्होंने मेरे आदेश देने पर भी सृष्टि के कार्य में मन नहीं लगाया। मुनिश्रेष्ठ नारद ! सनकादि कुमारों के दिये हुए नकारात्मक उत्तर को सुनकर मैंने बड़ा भयंकर क्रोध प्रकट किया। उस समय मुझपर मोह छा गया। उस अवसर पर मैंने मन-ही-मन भगवान् विष्णु का स्मरण किया। वे शीघ्र ही आ गये और उन्होंने समझाते हुए मुझसे कहा- ‘तुम भगवान् शिव की प्रसन्नता के लिये तपस्या करो।’ मुनिश्रेष्ठ ! श्रीहरि ने जब मुझे ऐसी शिक्षा दी, तब मैं महाघोर एवं उत्कृष्ट तप करने लगा। सृष्टि के लिये तपस्या करते हुए मेरी दोनों भौंहों और नासिका के मध्य भाग से, जो उनका अपना ही अविमुक्त नामक स्थान है, महेश्वर की तीन मूर्तियों में से अन्यतम पूर्णांश, सर्वेश्वर एवं दयासागर भगवान् शिव अर्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए। जो जन्म से रहित, तेज की राशि, सर्वज्ञ तथा सर्वस्त्रष्टा हैं, उन नीललोहित-नामधारी साक्षात् उमावल्लभ शंकर को सामने देख बड़ी भक्ति से मस्तक झुका उनकी स्तुति करके मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और उन देवदेवेश्वर से बोला- ‘प्रभो! आप भाँति- भाँति के जीवों की सृष्टि कीजिये।’ मेरी यह बात सुनकर उन देवाधिदेव महेश्वर रुद्र ने अपने ही समान बहुत-से रुद्रगणों की सृष्टि की। तब मैंने अपने स्वामी महेश्वर महारुद्र से फिर कहा- ‘देव! आप ऐसे जीवों की सृष्टि कीजिए, जो जन्म और मृत्यु के भय से युक्त हो।’ मुनिश्रेष्ठ ! मेरी ऐसी बात सुनकर करुणा सागर महादेव जी हँस पड़े और तत्काल इस प्रकार बोले।
महादेवजी ने कहा-विधातः ! मैं जन्म और मृत्यु के भय से युक्त अशोभन जीवों की सृष्टि नहीं करूँगा; क्योंकि वे कर्मों के अधीन हो दुःख के समुद्र में डूबे रहेंगे। मैं तो दुःख के सागर में डूबे हुए उन जीवों का उद्धार मात्र करूँगा, गुरु का स्वरूप धारण करके उत्तम ज्ञान प्रदान कर उन सबको संसार-सागर से पार करूँगा। प्रजापते ! दुःख में डूबे हुए सारे जीव की सृष्टि तो तुम्हीं करो। मेरी आज्ञा से इस कार्य में प्रवृत्त होने के कारण तुम्हें माया नहीं बाँध सकेगी। मुझसे ऐसा कहकर श्रीमान् भगवान् नीललोहित महादेव मेरे देखते-देखते अपने पार्षदों के साथ वहाँ से तत्काल तिरोहित हो गये।
(अध्याय १५)
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